सुनो अन्ना

व्यंग्य, जिन्हें पढ़ते ही आप के मुंह से निकलेगा "क्या गज़ब लिखता है,यार !"

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प्रदीप नील वसिष्ठ


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कौन सा भारत, अन्ना ?

Posted On: 23 Sep, 2012  
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जन लोकपाल बिल और राम फल का लोटा

Posted On: 20 Sep, 2012  
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कंवारों के लिए शपथ-पत्र

Posted On: 13 Sep, 2012  
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जब यमराज आए राम-लीला मैदान

Posted On: 12 Sep, 2012  
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मेरे 125 करोड़ बाप: और आपके ?

Posted On: 11 Sep, 2012  
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जूता पेलपाल बिल की महिमा

Posted On: 10 Sep, 2012  
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हिंदी दिवस: भारतीय गधे पर बैठा अंगरेज़

Posted On: 8 Sep, 2012  
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प्रदीप नील को कोई बतायेगा ?

Posted On: 7 Sep, 2012  
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कहाँ है भगत सिंह की दुल्हन ?

Posted On: 6 Sep, 2012  
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अन्ना, मेरा बाप चोर है

Posted On: 5 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: प्रदीप नील प्रदीप नील

सादर प्रणाम! “मैं फलाना सिंह वल्द धमकाना सिंह पूरे हो‘श में घोषणा करता हूं कि जिस तरह किसी डिप्लोमा में एड्मि‘शन लेने का मतलब पास हो जाना नहीं होता , उसी तरह ‘शादी का मतलब भी की ५-६ साल में 5-6 बच्चे पैदा कर देना नहीं होता. मैं उतने ही बच्चे पैदा करूंगा, जितने पाल सकता हूं. और् सरकार को अपनी आया बिल्कुल नहीं समझूंगा. जय हिंद बड़े भाई...............अंकल जी लोग दिख नहीं रहें हैं.............चलिए मैं ही भाई लोगों तक पहुंचा देता हूँ..............एक बार फिर उम्दा हास्य-व्यंग्य ......................... जाते-जाते एक विनती................कृपया अपनी दो पोस्टिंग के बीच कम से कम ३-४ दिन का गैप रखे ताकि हम सभी पोस्टिंग को सरलता और सहजता से पढ़ सके..............हार्दिक आभार.............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर प्रणाम! एक चैनल पर एक बहुत सुंदर एंकर खराब हिंदी उच्चारण में चिल्ला रही थी “ यह था अन्ना समर्थक जिसे सरकार को नींद से जगाने के लिए यह अजीबो-गरीब रूप धारण करना पडा यह फोटो सिर्फ हमारे चैनल पर है “ दूसरे चैनल पर उससे भी सुंदर एंकर उससे भी खराब हिंदी उच्चारण में चिल्ला रही थी “ यह था वही “उपद्रवी“ जिसे सरकार ने शान्तिपूरण आंदोलन को कुचलने के लिए भेजा था लेकिन अन्ना के बहादुर समर्थकों ने गेट से ही वापिस भागने को मज़बूर कर दिया. यह फोटो सिर्फ हमारे चैनल पर है “ यमराज मुंह लटका कर वापिस आए तो धर्मराज समझ गए.बोले“तो तुम्हारा डर भी खत्म ? अब क्या होगा ?“ यमराज बोले “ वही होगा जो चैनल वाले चाहेंगे.......................सुन्दर, सार्थक और हकीकत को व्यक्त करता हास्य-व्यंग्य.............मजा आ गया बड़े भाई..................एक और व्यवस्था पर आपने करारा प्रहार किया है................ http://merisada.jagranjunction.com/2012/09/13/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D-%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%9C/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपकी सड़क छाप शायरी बहुत ही पसनद आई..........नदिया से बोले भीगे किनारे, देखो तो फूटे भाग हमारे बांधा है तुमको बांहों में अपनी, फिर भी क्यूँ प्यासे लब ये हमारे ..बहुत खूब.................. वैसे तो मेरी अधिकतर शायरी मेरे डायरी में बंद है जो किसी विशेष अवसर के इंतज़ार में हैं फिर भी चाहूँगा की मेरी कुछ शायरी से आप मेरे इस पोस्ट पर जाकर अवगत हो.........http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/30/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/ और मेरी अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी जरुर पढ़े साथ ही .दुवायें या बदुवायें देने की कृपा करें.............शायद मेरी यह कहानी पूरी हो जाएँ........... http://merisada.jagranjunction.com/2012/02/15/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%b8/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

बड़े भाई................आपके सड़क छाप शेर पढ़े बिलकुल वह भाव जो मेरे शमशान छाप शेरों में होते हैं..............क्या खूब लिखा है आपने कि नदिया से बोले भीगे किनारे, देखो तो फूटे भाग हमारे बांधा है तुमको बांहों में अपनी, फिर भी क्यूँ प्यासे लब ये हमारे ............... मैं इस मंच पर अपनी बेशर्मी और अमर्यादित रूप के लिए बहुत ही प्रसिद्ध हूँ .......वो हरेक व्यक्ति जिसके विचार मुझको पसंद आते हैं...अपनी बेशर्म दिखाते हुए अपनी प्रेम कहानी पढ़ने और उस पर कमेन्ट करने को आमंत्रित करता हूँ..........आप भी सादर आमंत्रित हैं................ http://merisada.jagranjunction.com/2012/02/15/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%b8/ और कुछ शेर पढ़ना हो तो मेरे इस पोस्ट पर विजीट करें ............... http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/30/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रिय आशीष भाई , आपका सलाम क़ुबूल है . शुक्रगुजार भी हूँ . लेकिन फेसबुक के लिए माफ़ी चाहता हूँ . इस बाबत जो अनिल भाई को लिखा आप भी पढ़ लीजिए फेसबुक का नाम ले कर आपने मेरी दुखती रग छेड़ दी . कहानी लम्बी है . वैसे तो फेसबुक पर काफी समय से हूँ लेकिन जून २०१२ का पूरा महीना फेसबुक पर बीता. जिसका मुझे आज तक अफसोस होता है . असल में मैंने एक व्यंग्य-उपन्यास लिखना पूरा किया था मार्च २०१२ में और सोच रहा था कि जून की छुट्टियों में इसे एडिट करूँगा . जून में फेसबुक पर शायरी पोस्ट की. गज़ब का रेस्पोंस आया. प्रदीप नील को नशा हो गया, अनिल भाई फिर तो सुबह उस पर बैठता और देर रात तक उसी पर बना रहता. मेरे बच्चे मजाक उड़ाते कि देखो पापा सनक गए पापा ऐसे सनके कि छुटियाँ ख़त्म होने पर होश आया. उपन्यास धरा-धराया रह गया. फेसबुक का नशा उतरने में ही नहीं आ रहा था. फिर मैंने किसी कमीने आशिक की तरह अपने फैन-दोस्तों को नहीं बल्कि अपने आप को धोखा दिया . वहां लिखा कि एक महीने बाद आऊंगा. आज तक नहीं गया. इरादा भी नहीं है अभी. हाँ. आप वहां मेरी सड़क-छाप शायरी पढ़ सकते हैं सर्च कीजिए : शेष फिर कभी सप्रेम आपका

के द्वारा: प्रदीप नील प्रदीप नील

प्रिय भाई , आपके उन्मुक्त-कंठ से तारीफ पा कर बहुत भला लग रहा है . यही तो मेरा टोनिक है. फेसबुक का नाम ले कर आपने मेरी दुखती रग छेड़ दी . कहानी लम्बी है . वैसे तो फेसबुक पर काफी समय से हूँ लेकिन जून २०१२ का पूरा महीना फेसबुक पर बीता. जिसका मुझे आज तक अफसोस होता है . असल में मैंने एक व्यंग्य-उपन्यास लिखना पूरा किया था मार्च २०१२ में और सोच रहा था कि जून की छुट्टियों में इसे एडिट करूँगा . जून में फेसबुक पर शायरी पोस्ट की. गज़ब का रेस्पोंस आया. प्रदीप नील को नशा हो गया, अनिल भाई फिर तो सुबह उस पर बैठता और देर रात तक उसी पर बना रहता. मेरे बच्चे मजाक उड़ाते कि देखो पापा सनक गए पापा ऐसे सनके कि छुटियाँ ख़त्म होने पर होश आया. उपन्यास धरा-धराया रह गया. फेसबुक का नशा उतरने में ही नहीं आ रहा था. फिर मैंने किसी कमीने आशिक की तरह अपने फैन-दोस्तों को नहीं बल्कि अपने आप को धोखा दिया . वहां लिखा कि एक महीने बाद आऊंगा. आज तक नहीं गया. इरादा भी नहीं है अभी. हाँ. आप वहां मेरी सड़क-छाप शायरी पढ़ सकते हैं सर्च कीजिए : pardeep sharma ( pardeep neel) शेष फिर कभी सप्रेम आपका

के द्वारा: प्रदीप नील प्रदीप नील

के द्वारा: प्रदीप नील प्रदीप नील

प्रिय भाई, आपका कमेन्ट पढ़ कर मन श्रद्धा से भर उठा, आपके प्रति . आप की यह बात : एक ही उपाय ……………..बौद्धिक और मानसिक विकास ………….पर क्या हम सभी इसके लिए ………….स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से ऊपर सोचने की शक्ति रखते हैं……… एक अरसे से यही सोच मुझे राह दिखाए जा रही थी. आप ने भी यही कहा तो विशवास हो गया कि मैं अकेला नहीं हूँ , आगे से एक बात और याद रखें कि मेरी कोई रचना , विचार पसंद न आए तो " माफ़ कीजिए" कहने की ज़रूरत नहीं है . कोई असहमत होता है या बताता है कि उसे मेरा लिखा पसंद नहीं आया, वह मेरा सच्चा हितैषी है . वो कोमल ह्रदय कवि होते हैं जिनका ऐसी बातों से दिल टूट जाता है . आपका यह भाई तो व्यंग्य लिखता है यानी कहने की हिम्मत रखता है तो सुनने की भी सही कहा न ? सप्रेम आपका

के द्वारा: pardeep neel pardeep neel

सादर प्रणाम! सच पूछिये तो ऐसे बिलों की संख्या हमारे गावों में कुछ जयादा ही है लेकिन इस बिल को लागु करने वाला लोकपाल खुद अंदरसे इतना भ्रष्ट होता है कि इसकी आड़ में में पता नहीं कितनी माँ-बहनों को रखैल बना के रखता हैं..............जो स्पष्ट दर्शाता है कि हमारी संस्कृति अन्दर ही अन्दर सड़-गल गयी है जिसमे से अब बुन आ रही है.....................बस एक ही उपाय .................बौद्धिक और मानसिक विकास .............पर क्या हम सभी इसके लिए .............स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से ऊपर सोचने की शक्ति रखते हैं.....................माफ़ करियेगा आपके इस बिल के माध्यम से दुसरे बिल के लिए सन्देश पसंद नहीं आया...........फिर भी कहूँगा....................आप के कलम में कमाल की शक्ति हैं............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रिय दीक्षित जी , आभारी हूँ कि आप ने इधर आ कर पोस्ट पढने और टिप्पणी देने के लिए समय निकाला. आप के कमेन्ट से याद आया कि अंग्रेजों ने अत्याचार तो बहुतों पर किए थे लेकिन उनके कफ़न में आखरी कील तब माना गया था जब उन्होंने लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाई थी. याद मुझे यह भी आया कि अध्यापक,नेता और मीडिया के साथ मैं धर्म-गुरुओं को भूल गया था . सर मेरा यह दृढ विशवास है कि ये चारों वास्तव में समाज को सही राह दिखाते है और ये चारों सही कर्तव्य निभा रहे हैं तो उस देश का कभी पतन नहीं होता . नेताओं की मीडिया की अपनी मजबूरियां हैं लेकिन अध्यापक तथा धर्मं-गुरु पैसे से थोड़ा सा ध्यान हटा लें तो पूरे समाज पर असर होगा. बाकी आप समझदार हैं . आते रहिएगा ब्लॉग पर आपका अपना

के द्वारा: pardeep neel pardeep neel




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